One Nation One Election एक देश एक चुनाव -2023-24?

One Nation One Election एक देश एक चुनाव क्या है क्या यह लागू किया जा सकता है, एक देश, एक चुनाव: मोदी सरकार के लिए कितना मुश्किल, कितना आसान?

One Nation One Election विपक्षी गठबंधन को झटका देने को तैयार है मोदी सरकार का नया प्लान क्या वन नेशन वन इलेक्शन के बिल से मोदी सरकार करेंगे सत्ता में वापसी आखिर सरकार को क्यों जरूरत पड़ी वन नेशन वन इलेक्शन की साल 2014 में बीजेपी की सत्ता में आने और नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से ही देश में वन नेशन वन इलेक्शन की चर्चा तेज हो गई थी लेकिन ऐसा करना इतना आसान नहीं है एक बार फिर मोदी सरकार ने 2024 लोकसभा चुनाव से पहले इलेक्शन खेलते हुए नजर आ रही है 

18 से 22 सितंबर तक का संसद का विशेष सत्र बुलाया गया है मीडिया में आ रही खबरों की मानें तो इस सत्र में मोदी सरकार एक देश और एक चुनाव का बिल आ सकती है वहीं दूसरी तरफ सरकार ने इसके लिए एक कमेटी गठन किया है इस कमेटी का अध्यक्ष पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को बनाया गया है तो आइए जानते हैं रिपोर्ट बैंक वन नेशन वन इलेक्शन के मायने और क्या इसे लागू किया जा सकता है और क्या इससे पहले कभी ऐसा हुआ है.

कितनी पुरानी है ये बहस | साल 1999 के पहले से चर्चा होती रही है?

देखने वन नेशन वन इलेक्शन को लेकर साल 1999 के पहले से चर्चा होती रही है कई बार पिछली सरकारों ने भी इसे लागू करने की कोशिश की है कानूनी दांवपेच की वजह से यह मामला हर बार सस्ते बस्ते में डाल दिया जाता है इसकी जरूरत इसलिए भी है कि देश के किसी भी जिले में 1 साल में कम से कम 4 बार आचार संहिता लागू होता है लोकसभा चुनाव विधानसभा चुनाव नगर निगम और पंचायत चुनाव के समय आचार संहिता लागू किया जाता है 

आचार संहिता लगती है तो इसका सीधा असर विकास की योजनाओं पर पड़ता है देश में लगातार चुनाव की स्थिति रहने से सरकार को नीतिगत और प्रशासनिक फैसले लेने में परेशानी का सामना करना पड़ता है कई जरूरी काम से प्रभावित होते हैं 

आजादी के बाद जब पहली बार देश में चुनाव हुए थे तो सभी चुनाव एक साथ में हुए थे?

ऐसा नहीं है कि देश में एक साथ चुनाव नहीं हुए हैं आजादी के बाद जब पहली बार देश में चुनाव हुए थे तो सभी चुनाव एक साथ में हुए थे साल 1992 में जब देश में पहली बार आम चुनाव हुए तो उसके बाद राज्यों का चुनाव भी एक साथ ही कराया गया था इसके बाद 1957 1962 1967 में भी केंद्र और राज्य सरकारों के चुनाव में एक साथ कराई गई थी लेकिन साल 1967 में उत्तर प्रदेश में चौधरी चरण सिंह की बगावत के चलते सी पी गुप्ता की सरकार गिर गई और इससे विधानसभा और लोकसभा चुनाव का एक साथ कराने का क्रम टूट गया 

साल 1999 में जब वन नेशन वन इलेक्शन की चर्चा तेज हुई थी तो उस समय इसे विधि आयोग में भेज दिया गया था आयोग ने अपनी रिपोर्ट में इसका समर्थन किया था अगस्त 2018 में एक देश एक चुनाव पर लव कमीशन की रिपोर्ट भी आई थी लॉ कमीशन की रिपोर्ट में सुझाव दिया गया था कि देश में चुनाव कराए जा सकते हैं 

कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने संसद में बताया था कि देश भर में एक साथ एक चुनाव कराने के लिए संविधान में संशोधन करना होगा इसके लिए संविधान के अनुच्छेद और 83,85,172, 174,356  में संशोधन का जिक्र किया गया था 

लोकसभा चुनाव के वक्त एक देश- एक चुनाव का यह फॉर्मूला लागू होता है, तो एनडीए के मुकाबले इंडिया को ज्यादा नुकसान उठाना पड़ सकता है. क्यों, इस स्टोरी में विस्तार से जानिए?

यदि एक बार फिर एक साथ चुनाव होते हैं तो क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टियों को बड़ा नुकसान हो सकता है क्योंकि मतदाता विधानसभा में राज्य की समस्याओं को ध्यान में रखकर वोट करता है और लोकसभा देश की समस्याओं को देखकर वोट करता है तो क्षेत्रीय पार्टियों के पास राज्य का मुद्दा उठाने का एक पूरा मौका होता है और इस समय जो विपक्ष का राजनीतिक गठबंधन बना है वह एक साथ चुनाव होता है तो भी कर सकता है और इसका सीधा फायदा बीजेपी को होगा या फिर कांग्रेस को हो सकता है 

एक देश एक चुनाव One Nation One Election के फायदे नुकसान?

एक देश एक चुनाव (ONE) भारत में सभी स्तरों के सरकार के चुनावों को एक साथ कराने का प्रस्ताव है। इसके समर्थकों का तर्क है कि इससे कई फायदे होंगे, जैसे:

फायदे

  • पैसे की बचत: चुनाव आयोग का अनुमान है कि ONE से सरकार को हर पांच साल में लगभग 50,000 करोड़ रुपये की बचत होगी।
  • शासन बेहतर होगा: चुनावों के बीच के समय में, निर्वाचित प्रतिनिधियों के पास अपने काम पर ध्यान केंद्रित करने के लिए अधिक समय होगा। इससे भ्रष्टाचार कम करने और शासन की गुणवत्ता में सुधार करने में मदद मिलेगी।
  • राजनीतिक अस्थिरता कम होगी: चुनावों के बीच के समय में, सरकारें अधिक स्थिर होंगी। इससे नीतियों को लागू करना आसान हो जाएगा।

नुकसान

  • कार्यान्वयन में कठिनाई: सभी स्तरों के चुनावों को एक साथ कराने में कई चुनौतियां होंगी, जैसे कि मतदाताओं के पंजीकरण, मतदान केंद्रों की व्यवस्था और चुनावी सामग्री की खरीद।
  • संघीय ढांचे का उल्लंघन: भारत का संविधान राज्यों को अपने चुनावों को नियंत्रित करने का अधिकार देता है। कुछ लोगों का तर्क है कि ONE संघीय ढांचे का उल्लंघन करेगा।
  • मतदाताओं का मतदान का अधिकार छीनना: कुछ मतदाताओं को एक साथ होने वाले सभी चुनावों में मतदान करने में सक्षम नहीं हो सकते हैं। इससे उनका मतदान का अधिकार छिन जाएगा।

इन फायदों और नुकसानों को ध्यान में रखते हुए, ONE के बारे में कई सवाल उठते हैं। इनमें से कुछ सवालों के जवाब देने के लिए, भारत सरकार ने पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में एक समिति बनाई है। समिति को ONE की व्यवहार्यता का अध्ययन करने और सरकार को सिफारिशें देने का काम सौंपा गया है। यह देखना बाकी है कि समिति क्या सिफारिश करती है। यदि समिति ONE की सिफारिश करती है, तो इसे लागू करने के लिए संविधान में संशोधन की आवश्यकता होगी।

One Nation One Election पर केजरीवाल क्या कहते है क्या बोलै उन्होंने ट्विटर पर देखिये देश के लिए क्या ज़रूरी है?

 

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